शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं.....


पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने मन को बेहद नकारात्मक तरीके से विचलित किया। कहा जाता है ना कि किसी देश को बर्बाद करना हो तो उसकी युवा शक्ति को पथभ्रष्ट कर दो। दुख के साथ कहना पड़ रहा है….ऐसी ही आहट हमारे देश मे भी सुनाई दे रही है। 

आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता उसी तरह मानवता भी हर एक की बपौती नहीं है। जो इंसान, इंसान कहलाने के लायक नहीं उसके लिए अधिकार के क्या मायने हैं। वामपंथी या लैफ्टिस्ट होना बुरा नहीं है…देशद्रोही सोच होना खतरनाक है। जे एन यू में कार्यक्रम आयोजित करनेवाले छात्र का गौण उद्देश्य जो भी रहा हो…सीधा लक्ष्य सस्ता प्रचार पाना था। 



कहावत है, जा के पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई… भारत मे रह कर देशद्रोहियों के समर्थन मे नारे लगाने वालों को सिर्फ एक दिन के लिए दुर्गम सीमा पर तैनात जवानों की ज़िंदगी, जीना तो दूर, महज़ दिखाई जाए। शहीद जवानों के बच्चौं से मिलवाया जाए…जो उनसे पूछें कि हमारे पिता कि शहादत की क्या कीमत है जिस पर शायद तुम बिक चुके हो। 




अधिकार की बात करनेवाले इन जयचंद की संतानों से पूछा जाए कि किस हक़ कि बात तुम कर रहे हो। घर और  ज़मीन कश्मीरी पंडितों के थे…जिनको जबरन हथिया कर आज उस पर मालिकाना हक़ जताया जा रहा है….भाई, ग़ज़ब की सीनाजोरी है। 


आख़िर मे, जो प्रबुद्धजन देश मे असहिष्णुता का राग आलापते हैं उनके लिए कुछ पंक्तियाँ। सहिष्णुता का इससे बड़ा क्या सबूत होगा कि भारत की सम्प्रभुता मे छेद करने वालों को खुली हवा मे सांस लेने की आज़ादी है… वर्ना इन जैसों के लिए उत्तर कोरिया ही सही जगह है…. ना मुकदमा ना ही सफाई…बस इल्ज़ाम और सीधे फैसला 

मंगलवार, 26 मई 2015

मोदी सरकार :केवल वादे या मज़बूत इरादे



लीजिये आज 26 मई का दिन भी आखिर बीत ही गया। पिछले कई हफ़्तों  से मोदी सरकार के 365 दिन पूरे होने का इंतज़ार किस शिद्दत किया जा रहा था ये हम सब देख ही रहे हैं। दर्जनों चर्चाओं, रिपोर्टों और आंकड़ों से हर चैनल ये साबित करने पर तुला हुआ था कि मोदी पास हुए हैं या फ़ेल।  
बुरे दिन बीते हों या नहीं इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है जैसे नई- नवेली दुल्हन से घरवालों क्या घर के नौकरों, रिश्तेदारों और आस - पड़ोसियों को भी बहुत सी उम्मीदें होती हैं। लेकिन उन उम्मीदों पर एकाएक खरा उतारना कितना मुश्किल होता है ये सब जानते हैं।  
हाँ ! ये ज़रूर है कि पिछली सरकार जैसे अपने घोटालों के कारण चर्चा में रहती थी उस तरह के घोटाले पिछले एक साल में सुनने में नहीं आये। ऐसा भी लगता है कि एक एक पायदान चढ़ते हुए हम यहाँ से तो आगे ही निकल जायेंगे। ऐसा कहने या सोचने के कई कारण हैं। 
शपथ ग्रहण के दिन से देश के रुतबे और ताकत का अहसास पडोसी देशों को बताना और ये जताना के बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। विदेशों की यात्राओं का मतलब महज़ सैर - सपाटा नहीं है बल्कि दुनिया की मज़बूत अर्थव्यवस्थाओं का ध्यान देश की तरफ खींचना वैसा ही है जैसे पुराने कारखाने के बारे में , जिसमें अनगिनत बेरोज़गार कारीगर हैं, निवेशकों को बताना। बिना विज्ञापन के तो सरदर्द  की दवा नहीं बिकती तो देश में करोड़ों रुपये का निवेश का तो सवाल ही नहीं उठता। 


वहीं कूटनीति के नज़रिये से देखें तो संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की माँग एक अरसे से उठाई जाती रही है लेकिन बिना व्यावसायिक, आर्थिक और सामरिक तौर पर मज़बूत हुए इस बारे मुंह खोलना बेमानी है। इसी तरह कश्मीर मुद्दे पर विश्व में एक आम राय बनाना भी ज़रूरी है कि ये एक द्विपक्षीय मुद्दा है। दुनिया को ये बताना कि भारत विश्व शांति में विश्वास रखता है और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को जताते हुए विश्व शांति के लिए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव भारत के लिए एक मील का पत्थर है। 
रेडिओ पर मन की बात हो या mygov.in वेब पोर्टल सुदूर गावों की जनता से लेकर देश के पढ़े - लिखे जवानों तक सभी की राय जानने की कोशिश करना और सरकारी योजनाओं से उनको अवगत करवाना एक अनोखी पहल है। मोदी जिस भी जगह भाषण देते हैं वहां उनके करिश्माई व्यक्तिव की छाप तो छूटती है ही सुनने वालों में से दो - चार भी उनकी कही बातों पर अमल करने लगे तो धीरे - धीरे ही सही देश में बदलाव तो आएगा।  

सोमवार, 12 अगस्त 2013

मिल कर करने हैं कुछ काम....... रघुपति राघव राजा राम





 
 
 
 
 
 
 
 
                                                 जम्मू -कश्मीर के हालात अच्छे नहीं हैं।  पहले उत्तराखंड त्रासदी फिर सीमा पर जवानों का शहीद होना जिसने सारे देश को दहला  दिया और फिर किश्तवाड़ में हुए दंगे।  राजनेताओं ने शहीदों की शहादत पर खूब राजनीति की … कुछ ने तो सारी हद तोड़ते हुए शर्मनाक बयान भी दिए,  अब मानसून सत्र  में चल रहा कीचड़ खेल ।  राजनीति के रंगमंच के ये विदूषक इतने तमाशे बेहिचक कैसे कर लेते है।  कभी -कभी ऐसा लगता है कि हम हिंदुस्तानी शायद इसी लायक हैं। यही नहीं कुछ और समय ऐसे ही चलने दीजिये वो दिन दूर नहीं जब हम दोबारा गुलाम होंगे। 
 
एक और बात है जो इन दिनों चर्चा में रही ईमानदार नौकरशाहों को काम  नहीं करने देना। पहले दुर्गा शक्ति का निलंबन फिर उस पर हुई राजनीति के सब साक्षी हैं। ... उन्ही के बैच के एक और अधिकारी, युनुस खान , जो इस समय हिमाचल में रेत  -माफिया से निपटने की कोशिश कर रहे हैं , उन्हें जान से मरने की कोशिश की गई। राजनेताओं और माफियाओं से टकराने की जिस किसी अधिकारी ने जुर्रत की है उनके तबादलों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होती है। अरुणा राय ,अरविन्द केजरीवाल ,किरण बेदी ,अशोक खेमका और न जाने कितने अफसर जो अपने उसूलों से नहीं डिगे ,या तो इस्तीफा दे देते हैं या हाशिये पर नौकरी के दिन कट रहे हैं। 
 
जनता भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है. एक तरफ  देश की  सीमा पर जवान शहीद हो रहे हैं  ऐसे में सारे देश की जनता को दूसरे मुद्दों को नहीं खड़ा करना चाहिए। लेकिन जनता दिमाग से खाली  हो  चुकी  है तभी तो कभी तेलंगाना तो कभी संयुक्त आन्ध्र , गोरखालैंड,बोडोलैंड ,विदर्भ ,बुंदेलखंड  और हरित प्रदेश की मांग को लेकर जुलूस और दंगे हो रहे हैं। कितना अजीब है के कुछ लोग कितनी आसानी से  अपने फायदे के लिए सारी जनता को दंगों और आंदोलनों में झोंक देते हैं। हिन्दू -मुस्लिम में आम लोगों को बाँट देते हैं। अगड़ी -पिछड़ी जात या अल्पसंख्यक  जैसे झुनझुने बजा कर निजी स्वार्थ हल लेते हैं। 
 
समझ नहीं आता सेना का मनोबल गिरा कर ,सच्चाई और ईमानदारी से देश सेवा करने वाले अफसरों दरकिनार कर और लोगों को बाँट कर कौनसा भारत निर्माण हो रहा है. । मन दुखी है उदास है। ….चाहता है की आज़ादी के इस जश्न पर ईश्वर देश के लोगों को सद्बुद्धि दे ताकि हम हिन्दू मुस्लिम सिख या किसी और धर्म और जाति के बनने से पहले हिंदुस्तानी बन सकें। ओछी राजनीति से ऊपर उठ सके.… सही और गलत के फर्क को समझ सकें। समाज के ठेकेदारों के बहकावे से दूर एक विकसित भारत का निर्माण कर सकें। अब सहने की नहीं सही को चुनने की समझ देना चुनाव की तारीख को 'नेशनल हॉलिडे 'न माने  ताकि जो लोग देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर गए उनकी आत्मा को शर्मिंदगी की बजाय..... थोड़ी शांति मिले। 
 
 
 
 
 
 

शनिवार, 13 जुलाई 2013

वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी...




बहुत दिनों से उमस बढ़ गई है...मौसम में और जीवन में...इंतजार कर रही हूँ...बारिश का ...जो भीगा दे
सबसडको-गलियों को ....धो डाले हर तरह की धूल को....तर कर दे दुनिया की प्यास को ..दे संतोष उस 
अतृप्त जीवन शैली को जो हमसे कहीं छूट गई है... आगे बढ़ने की चाहत में....
 
 


बाजारवाद कितना हावी हो गया है कि माँ को अगर बच्चों कि दुनिया होना है मिक्स तो उसे रीमिक्स होना पड़ेगा और चन्दा है तू मेरा सूरज है तू के रैप पर रॉक एन रोल करना पड़ेगा...बस यहीं से शुरुआत समझ लो...भटकाव की...सुबह के नाश्ते में माँ के हाथों से बने पराठे अब नहीं भाते...हाँ आर्मी की तैयारी करते हुए कॉर्न-फ्लेक्स खाना ज़रूर अच्छा लगता है...पढने से पहले टैंग पीना ज़रूरी होता है...बिना बोर्नविटा-कॉम्प्लान पिए सारी दुनिया नाटी या बौनी रह जाएगी...
 
इसे छोडिये बिना गोरेपन की क्रीम लगाये लड़की ब्यूटी कांटेस्ट नहीं जीत सकती...ओय्ली स्किन की वजह से स्टेज पर गाना नहीं गया जासकता...अब तो पहलवानों के लिए भी मर्दों वाली क्रीम लगाना ज़रूरी है...
 
हेमा  रेखा जया और सुषमा में निरमा से धुले कपडे पहनने के बाद असीम शक्ति आ जाती है.. वहीं महंगी वाली सफेदी के लिए दो पडोसने एक -दूसरे को नीचा दिखाने से नहीं चूकती..... दूसरी तरफ बिना टाइड लिए पति मिसेज़ के मुलायम हाथ नहीं देख सकता
 
ताज़े पके खाने की खुशबू रेडी टू ईट ने ले ली... घर पहुचने से पहले दफ्तर में औरत शाम को टेस्टी -टेस्टी खाना बनाने के लिए सब्जी के मसालों में उलझी पड़ी है...प्यास लगने पर लोग कुछ तूफानी करने की सोचते हैं...ऐसा ही कुछ करते हुए डर के आगे मौत नहीं जीत दिखती है....और अलाइव फील करने के लिए पहाड़ों से छलांग लगाने से भी परहेज़ नहीं है.....आखिर क्या है ये सब .......लगता है न बेहद वाहियात...
 
समय बढ़ा, महंगाई बढ़ी....पैसा बढ़ा....दूरियां बढ़ी...पहले हर चीज़ की एक सीमा -एक हद होती थी आज सब कुछ बेहद- बेलगाम है...कहने का मतलब ये नहीं है कि जो इंसान सुख सुविधा पसंद है वो ख़राब है...लेकिन ये भी तो सही नहीं है न के पडोसी की बड़ी कार की जलन में अपनी कार को "बेच दे"
 
टी. वी. चैनलों की भरमार ने आपस में बात करने का समय खा लिया है...और विचार- मंथन का समय एफ.एम. चैनल के मुर्गों- बकरों या चुलबुली कुड़ियों ने.... व्यावहारिक दुनिया बदल गई है....आने वाले समय में शायद इस जैसी चीज़ का कोई अस्तित्व ही न हो....सब कुछ वर्चुअल हो जायेगा ...




कभी -कभी उन भावनाओं के लिए असीम सम्मान आ जाता है जब याद आता है की दादी-नानी बनने की ख़ुशी में घर की बड़ी औरतें अपनी बहु- बेटियों को सीख देती थी...आज डाक्टर से पूछे बिना नई माँ को गोंद-गिरी के लड्डू नहीं खिलाये जा सकते ...शहर से गाँव जाता बेटा सब के लिए कुछ न कुछ खरीद के ले जाता था उसका आना परिवार वालों के लिए किसी त्यौहार से कम नहीं होता था....आज वो ख़ुशी बहुत कम दिखती है
 
होली-दिवाली पर घर के बने पकवानों की खुशबू नहीं आती....याद है बचपन में कैसे मन ललचाता था सोचते थे कब पूजा होगी...कब मिलेगी गुजिया-मट्ठी खाने को...माँ की हिदायत जो होती थी...और छोटे भाई-बहनों का मिठाई चुरा के लाना...और घर के किसी कोने में छुप छुप खाना  
 
भीगने का इंतजार पेड़-पौधे,जीव और मानुष सभी करते थे...पहली बरसात में नहाना प्रकृति का उत्सव होता था जिसमे सब शामिल होते थे...पंछी परों को उठा कर हर तरफ से भीगने की कोशिश करते थे...तो मोर नाचने लगते थे...गाय, भैस, घोड़े,ऊँट....सब शांत खड़े रह कर भीगने का मज़ा लेते थे... और हम अपनी कागज़ की कश्तियों को बारिश के पानी में चला कर ये सोचते थे के न जाने कौनसे नए टापू को हम खोज डालेगे....
 
कितना बेरहम है ये समय इसने सब से सब कुछ छीन लिया परिवार से बच्चे...बच्चों से परिवार....आत्मा से जुड़े रिश्ते...और रिश्तों की आत्मा ....
 
जो आनंद अल्हड़पन का, भोलेपन का,जीवन में छुपे लय-ताल और कला का पहले के लोगों ने लिया... वो हम नहीं ले पाए...इसी तरह आने वाली पीढ़ी के साथ होगा...बारिश तो होगी पर उसमे चलने के लिए कंप्यूटर एक्सपर्ट e -कश्ती ज़रूर इजाद कर देंगे 
 

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

सात करोड़ में से एक होने पर आप सभी को बधाई!


 
 
सात करोड़ में से एक होने पर आप सभी को बधाई! जानना चाहेंगे क्यूँ ? 
 
आज  विश्व  जनसंख्या दिवस जो है . बचपन से ही हम ये पढ़ते आ रहे हैं कि इसी तरह तादाद बढती रही तो जनसंख्या विस्फोट हो सकता है . शायद हो भी रहा है ...कहीं और की बात क्यूँ करें हमारा देश तो खुद इस मामले में दूसरे नंबर पर है . अच्छे कामों में तो शायद क्या ही कभी आगे रहेगा . भ्रष्टाचार , गरीबी , घोटाले ,अपराध और जनसंख्या बढ़ने में बस अव्वल ही समझो ....समय समय पर हमारी सरकारें बहुत सी योजनायें ले कर आई हैं जो जनता के कल्याण के लिए बनाई  गई ...छोटा परिवार ...खुशियों का आधार ...जननी सुरक्षा योजना ,स्कूल चलें हम या राष्ट्रीय साक्षरता मिशन  , मिड डे मील  या लाडली सुरक्षा ....कागज़ी तौर पर ये सभी सराहनीय हैं लेकिन हकीकत के धरातल से अब भी काफी दूर हैं . या यूँ कह लें की सभी योजनायें घोटालों की भेट चढ़ गई हैं ...लेकिन भारत निर्माण तो हो ही रहा हैं .....यहाँ नहीं कहीं और ही सही ....
 
 
खैर हमारा विषय था जनसख्या विस्फोट .... किसी भी महिला के लिए  माँ बनाना हमेशा एक उपलब्धि ही हो ...ज़रूरी नहीं है ...कहानी -किस्सों और कविताओं को छोड़ दें तो आज की तारिख में माँ बनाना .... एक वर्ग के लिए ख़ुशी ....दूसरे के लिए ज़िम्मेदारी .... और एक बड़े वर्ग के लिए बिना सोच-समझ के साथ बढाया हुआ कुनबा भर है ....ये समस्या खास कर भारत और तीसरी दुनिया के उन देशों की है जो उन्नीसवीं -बीसवीं सदी में आज़ाद हुए हैं .....हास्यास्पद  है लेकिन छोटी सी दिखने वाली इस समस्या ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है .
 

इस बार सयुक्त राष्ट्र संघ ने जिस  मुद्दे को साल 2013 की थीम बनाया है वो है ' किशोरावस्था  में मातृत्व '  ....या यूँ कह ले कि  हकीकत में ये उन देशीं की समस्या है जहां वास्तव में आबादी बहुत ज्यादा है . जब एक परिवार में ज्यादा बच्चे होते हैं तो कुपोषण की सम्भावना सबसे ज्यादा होती है ....परिवार की आमदनी सही भी हो तो भी  पालन -पोषण की तंगी लगी रहती है ...लड़कों  को तो  पढाई- लिखाई नसीब हो भी जाये पर लड़कियों को वो भी नहीं होती .....दिल्ली की झुग्गी और बस्तियों में चलने वाले स्कूलों का आलम ये है की ....बच्चे आते ही नहीं ....कहीं -कहीं अध्यापकों को स्कूल में बच्चों को समझा बुझा के लाना पड़ता है ...कि  तुम्हे दिन में खाना मिलेगा ...लेकिन ग़रीबी ने इन बच्चों से मासूमियत छीन कर इन्हें मक्कार बना दिया है ....वे स्कूल जाते तो हैं लेकिन खाना (मिड डे मील ) मिलने से ठीक पहले और उसके बाद पिछले दरवाज़ों से अपने बोरे  उठा कर कचरा बीनने चले जाते हैं .

 
कम उम्र में मातृत्व का दूसरा कारण लड़का लड़की में भेद -भाव का है ....और ऐसा सिर्फ हमारे यहाँ होता ये सच नहीं है ये तो दुनिया के कई देशों की कहानी है छोटी उम्र में शादी ...दो नासमझ लोगों को पति -पत्नी और आने वाले समय में लाचार माँ -बाप बना देती है ....शायद पढने -सुनने  में अच्छा न लगे लेकिन यही वर्ग है जो बिना किसी अपराध -बोध के अनगिनत बच्चे पैदा करता है ....हाँ ये बात सच है अगर माता -पिता बच्चे को अच्छी  परवरिश नहीं दे सकते तो उन्हें परिवार बढाने का भी कोई हक़ नहीं है ....
 
 
 
ज़रुरत सिर्फ सोच को बदलने की है ....लड़का -लड़की में भेद अब गुज़रे ज़माने की बात हो चुकी है ....केवल पालने की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए बेटी की शादी जल्दी करना सरासर ग़लत है ....एक अविकसित लड़की , बीमार और कमज़ोर माँ साबित होती है ....हाँ ये बात और है के हाथ -पाँव तो चलते हैं पर शरीर खोखला हो जाता है ....
 
देर से शादी होना ...शायद इस दिशा में एक अहम् कदम साबित हो और उस से भी पहले लड़की को देवी या पूजिता की छवि से बाहर  निकाल कर इंसान की श्रेणी में शामिल करना .... उसे भी लड़कों के बराबर प्यार, सम्मान ,अधिकार  और आत्मनिर्भर बनाना ....
 
क्यूँ हो लड़कियों या महिलाओं  से भेद-भाव ?क्या लड़कों और पुरुषों की तरह  उनके खून का रंग लाल नहीं ....क्या ये सोच ज़रूरी नहीं की जिस तरह किसी आदमी को अपनी माँ के  दर्द का एहसास होता है ...वैसा ही दर्द अपनी पत्नी या बेटी के लिए क्यूँ नहीं ?
 
 आज विश्व जनसंख्या दिवस पर हो सके तो  केवल इतना करें ...अपने आस -पास जैसे घर की मेड ,सफाई वाली ,सब्जी बेचने वाली या किसी भी महिला पर होते इस खामोश अत्याचार को होने से रोकें ....समझाएं ...बात करें ....शायद कोई बात बन जाये ....
 
 

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

औरत .... . औरत .....!और औरत ......?


हमेशा की तरह आज भी वो उसज कुर्सी पर बैठी है ,शायद कोई ऐसा काम कर रही है जिसे करने में उसे मुश्किल आ रही है....छुट्टी हो चुकी है ...एक -एक कर के सभी लोग स्टाफ -रूम में इकट्ठा हो रहे हैं .....इतने दिनों बाद उसे अपने बीच देख कर सभी हैरान हैं .... आज यहाँ का माहौल बदला बदला सा है । रोज़ की तरह हल्ला - गुल्ला नहीं है ....कोई फालतू गप्पबाज़ी भी नहीं ... सभी चुप है.....छुप छुप के उसे देख रहे हैं .... गले पर दिखते निशान .... उसके भयानक कदम के साक्षी हैं ....जो देखने वालों के रोंगटे खड़े करते हैं ....दुःख देते हैं .... पूछना सभीचाहते हैं ....जानना चाहते हैं कि वो कैसी है ? आखिर उसने ऐसा क्यों किया ? क्यों उसके सब्र का बाँध टूट गया ....जो उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया ......



चहेरे पर थकावट है ...नीची नज़रें कर के वो अपना काम जल्द से जल्द ख़तम कर देना चाहती है ....मैं उसकी हिम्मत देख कर हैरान हूँ कि वो इतनी जल्दी स्कूल कैसे आ गई ????....चाह रही हूँ कि उसको गले लगा कर खूब रो लूँ ....जो दुःख उसकी आखों में है उसे दूर करना चाह रही हूँ ...लेकिन हिम्मत नहीं हो पा रही ....मैं इसी उधेड़बुन से नहीं उबर पाई कि वो खासी तकलीफ के साथ अपनी कुर्सी से उठती है और मेरे पास आती है .....बोलने में उसे काफी दिक्कत आ रही है .....आज उसकी आवाज़ में जोश नहीं है ....शायद दुपट्टा कुछ ज्यादा कस गया था ......दबी और थकी आवाज़ में बोली "तुम भी मुझसे मिलने नहीं आई ....किसी और से तो नहीं ....पर मुझे ये उम्मीद थी के तुम तो मिलने ज़रूर आओगी ....क्या हम लोग एक हाउस के हैं ...बस हमारी दोस्ती यहीं तक है ...."
आंसू नहीं रुक पाए ..सो बह गए .....मैं उसे अपने साथ वहाँ से पास कि क्लास में ले आई....
मैंने पूछा "अभी कहाँ रह रही हो...?"
..."ससुराल में "..उसने कहा ।
....."क्या ?.....क्या हो तुम ?...जिन लोगों ने तुम्हे मरने के लिए छोड़ दिया ....परवाह भी नहीं की ...अब भी उन्ही के साथ हो...क्यों ?"
......हाथ जोड़ कर ,भरी हुई आखों से जवाब देती है ....."मेरे दो बच्चे हैं .....और पति का बर्ताव भी बदल गया हैं......वो बुरे नहीं हैं ...... प्यार भी करते हैं... ....शायद अब सब कुछ ठीक हो जायेगा .....वो कहते हैं कि अब वो मेरा ख़याल रखेंगे...."। "अगर घर में रहना इतना मुश्किल है तो ...."
मेरी बात अभी पूरी भी नहीं होती कि वो कहती है कि "औरत की ज़िन्दगी यही है ....चाहे हम १८ वी सदी में जिए या २१ में.... औरत वहीं कि वहीं हैं .... जूतों के नीचे ...
मैंने उन्हें कई बार समझाया ...पर वो नहीं माने ....और जब तक उन्हें मेरी हालत का सही अंदाज़ा हुआ तब तक मेरी हिम्मत टूट गई थी ....."थोड़ी देर चुप रहती है फिर कहती है ..."लेकिन ये सच है कि प्यार तो वो मुझे अब भी करते हैं .... ।
उसकी ये बात मेरी समझ से परे है ... सवाल बहुत सारे थे लेकिन और कुछ पूछ सकूँ ऐसे हालात नहीं लगे ....
घडी कि तरफ देखा और बोला"घर चलने का टाइम हो गया है ....चलो मैं तुम्हे छोड़ दूंगी । "
...उसने मुझे कहा .".....नहीं तुम चलो ....उन्होंने कहा है कि वो मुझे लेने आयेंगे ....मैं यहाँ उनका इंतज़ार करूंगी ।"


........उसकी बात सुन कर मुझे लगा ये कि ....हाँ ये सच है....







औरत का मन ....कोई नहीं पढ़ सकता ...कोई नहीं.....शायद ....कोई दूसरी औरत भी नहीं.... 0 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

फितरत








सभी पहाड़ एक से नहीं होते .....कुछ ऊचे तो कुछ कम लम्बे होते हैं ....कुछ हरे भरे और कुछ...... कुछ उजड़े ...कुछ हमेशा ...हर मौसम में एक से ही रहते हैं ....






कुछ पहाड़ रंग भी बदलते हैं ...जैसे जैसे आसमान की चमकती गेंद पाला बदलती है वैसे ही ये भी बदल जाते हैं ....









सभी पहाड़ दूसरी तरफ गुजरने की इजाज़त नहीं देते .....जैसे हुकूमत करते हैं ......
हाँ ! कुछ पहाड़ों में मोड़ भरे छोटे ....लेकिन टेढ़े -मेढ़े रास्ते होते हैं ...गुज़रते समय डर का एहसास करवाते हैं ...ये ... ।






सभी पहाड़ सूखे नहीं होते ...घने दरख्तों ....खुशबूदार फूलों और फलों से भरे होते हैं ....



और कुछ हरियाली ओढ़े हुए भी सूखे होते हैं ....











कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कुछ पहाड़ शाप भी देते हैं ....













सभी पहाड़ आवाज़ नहीं देते ....कुछ ठंडी पुरवा के साथ ख़ामोशी से कानो के नज़दीक चुपके से कोई पैग़ाम छोड़ जाते हैं







......तो कुछ कोसों .....मीलों दूर से अपने पास बुलाते हैं ....






हाँ ! सभी पहाड़ एक से नहीं होते .......लेकिन फितरत के लिहाज़ से ..... क्या ये हम जैसे नहीं होते ?