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गुरुवार, ३ दिसम्बर २००९

क्यों कैट पर भारी पड़े माउस ...?



हाल ही में कैट प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की गई । पहली बार यह परीक्षा ऑनलाइन ली गई लेकिन हश्र क्या हुआ इससे सभी वाकिफ हैं । एस वाकिये से जो बात उभर के सामने आती है वो ये कि शिक्षा के उच्च स्तर पर भी हमारे संसाधन उतने ही लचर हैं जितने कि प्राथमिक या माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के हैं । भारतीय प्रतियोगी परीक्षाएं चाहे वे प्रशासनिक सेवाएँ हो या कैट ,मैट या अन्य कोई प्रतियोगी परीक्षा एक मानक स्तर प्राप्त कर चुकी हैं । लेकिन अध्ययन और अध्यापन कि ओर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे की तमाम कोशिशों के बाद भी हमारा देश अध्यापन के तकनिकी क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है । यह अलग बात है की अध्यापन की नई तकनीकों की खोज जारी है किन्तु क्या इन तकनीकों को लागू करने में हम सक्षम हैं ?

नित नई परीक्षाएं जन्म ले रही हैं साथ ही नई पद्धतियाँ निर्धारित की जा रही हैं . शिक्षा भी एक कोर्पोरेट उद्योग की भाति दिन दूनी रात चौगुनी उन्नत्ति कर रहा है .ज्यादा दूर न जा कर केवल प्राथमिक स्तर पर गौर करें तो आप पायेंगे की गली मोहल्ले में सब्जी-भाजी की दूकाने उतनी नहीं होंगी जितने प्राइमरी स्कूल . अछे स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहते हैं तो कई दिनों तक कतारों में लग कर भी सफलता मिल जाए तो अपने आप को धन्य मानिए .





अध्यापन पद्धति की चर्चा करें तो हम पायेंगे कि प्राथमिक स्तर से लेकर कॉलेज तक एक पद्धति बहुत लोकप्रिय है जिसे लेक्चर मैथड कहा जाता है और मूल्यांकन का भी यही हाल है . कहने का तात्पर्य यह है कि महज़ अच्छी बिल्डिंग , सुसज्जित कक्षा-कक्ष,प्रशिक्षित अद्यापक ,कुछ सुंदर सहायक शिक्षण सामग्री होने से स्कूल अच्छा है इसकी गारंटी हो जाती है...?

अब भी उन्ही पारंपरिक तौर -तरीकों से अध्यापन और मूल्यांकन किया जा रहा है , जिन से किसी ज़माने में हमारे माता -पिता का हुआ करता था . तात्पर्य यह है कि उन्नत संसाधन होना जितना आवश्यक है उतना ही ज़रूरी उन संसाधनों का उपयोग. प्रशिक्षित शिक्षक होने के साथ-साथ नवीन तकनीकों से अद्यापन भी ज़रूरी है .इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि मूल्यांकन भी नवीन पद्धतियों से हो ....पूर्व समय में पारंपरिक शिक्षा पद्धति सामानयज्ञों को तैयार करने में अव्वल थी ....लेकिन आज ज़माना विशेषज्ञता का है .





.... हो सकता है कोई बच्चा जितना अच्छा लिखने के कौशल में अंक ला सकता हो ...उतना पढने या रचनात्मक कौशल में न ला सके .....इसके विपरीत कोई विद्यार्थी ऐसा भी हो सकता है जो क्रियात्मक कौशल में उम्दा हो मगर लिखने में कमज़ोर ...अतः आवश्यता है प्रत्येक कौशल के अनुसार परीक्षा पद्धति विकसित करने की साथ ही नवीन संसाधनों के त्वरित विकास की . ताकि प्रारंभिक स्तर से ही विद्यार्थी विशेष की रूचि का पता चल सके ....१२ वीं कक्षा के बाद वह अँधेरे में तीर चलाते सिपाही जैसा न बने .... और आने वाले समय में कोई माउस किसी कैट पर भरी न पड़े

बुधवार, २५ नवम्बर २००९

अब राइट टु रिकाल चाहिए ...




१९४७ में संविधान निर्माण के समय..... विश्व के अनेक संविधानों से कई उपबंधों का समावेश हमारे संविधान में भी किया गया । इसके पीछे के उद्देश्य के बार में हम सभी जानते हैं ..... लेकिन इस वक्त जिस बात का ज़िक्र मैं करना चाहती हूँ वो ये है कि...समय ,परिस्तिथी तथा देश काल के अनुरूप हर वस्तु परिवर्तन चाहती है .... कहने का तात्पर्य ये है कि तालाब का पानी बनने से बेहतर है बहता झरना बना जाए ।


बीते कुछ सालों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब लगता है ....अरे॥! किसने इस आदमी को लोकसभा में पहुंचा दिया .... । कई बार विधानसभाओं में शर्मसार कारनामे हुए हैं ....जिन्हें लोगों ने टी.वी.पर देखा है । और घोटालों तथा अपराधीकरण की तो बात ही छोडिये....इन सब की फेहरिस्त बने तो एक नए महाकाव्य का जनम हो सकता है । ऐसा लगता है कि हम लोग लोकतंत्र की मूल भावना को भूल गए हैं । 'विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र ' ये एक ऐसा राग है जिसे कभी कभी हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि आलाप देते हैं .... जो वास्तविक अर्थ से कोसो दूर है।


दरअसल इन राजनीतिक पार्टियों के पास सत्ता की स्वार्थ परक रोटियाँ सकने के लिए मुद्दे चाहिए जैसे जातिवाद .... धर्म तथा भूमिगत आधार पर कैसे .... । अब यक्ष प्रश्न ये है कि- वर्ष के लिए जिन प्रतिनिधियों को देश की बागडोर सौपी जाती है उनके काम का मूल्यांकन कैसे किया जाए .....कैसे उन्हें जवाबदेह बनाया जाए ? कैसे उनको सत्ता से बाहर जा sakta रखा है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर है राइट टु रिकाल . इसका अर्थ है प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की व्यवस्था . इस व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण इस समय स्वित्ज़रलैंड का संविधान है .नेताओं के कार्यों और निर्णयों का वार्षिक मूल्यांकन होना चाहिए , साथ ही भ्रष्ट और जनता में जातिवाद भाषावादी और क्षेत्रवादी उन्माद फ़ैलाने वाले नेताओं का मूल्यांकन भी जनता के सामने रखा जाए

जो नेता या प्रतिनिधि अपने व्यतिगत वायदों और कार्यों के प्रति ईमानदार न लगे उसका कार्यकाल समाप्त कर उसके स्थान पर उस व्यक्ति को मौका दिया जाना चाहिए जो चुनावो में सर्वाधिक वोट पाने वाला द्वितीय उमीदवार रहा हो .

राइट टु रिकाल व्यवस्था के अंतर्गत उन व्यक्तियों को भी सदन से अस्थाई तौर पर निलंबित कर देना चाहिए जो किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हों . यह एक अलग और हास्यास्पद बात होगी की इस तरह की व्यवस्था से भारत की विधानसभाएं और लोकसभा सूनी हो जाएँगी . लेकिन इसका सार्थक पहलू यह होगा की नए लोगों को अवसर उपलब्ध होगा . यह नहीं कहा जा सकता की इस व्यवस्था से भ्रष्टाचार और स्वार्थपरक राजनीति का अंत हो जायेगा लेकिन तंत्र सुधार की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम होगा ..

शुक्रवार, २१ अगस्त २००९

जन्माष्टमी और हवेली मन्दिर


पिछले दिनों जन्माष्टमी बड़े धूम - धाम से मनाई गई । यहाँ उत्तर भारत की जन्माष्टमी मुख्य रूप से राजस्थान ,गुजरात और उत्तर प्रदेश में यह दिन अलग तरह से मनाया जाता है। कई दिन पहले से कृष्ण जनम झांकियां और लीलाएं शरू हो जाती हैं। मंदिरों को हज रोज़ एक नए तरीके से सजाया जाता है ,कभी मोतियों से तो कभी फूलों से । इन दिनों मदिरों का श्रंगार दिन मैं कई बार बदला जाता है।

हर बार नए रूप में कृष्ण और उनसे सम्बंधित घटनाओं का चित्रण और सजावट की जाती है ।


यहाँ के कृष्ण मंदिरों की कई विशेषताएँ हैं ,जैसे इन मंदिरों का स्थापत्य ...कृष्ण -श्रंगार ....झांकियां इत्यादि ...मंदिरों को अगर ध्यान से देखें तो ये किसी हवेली जैसे लगते हैं । इसका कारन ये है कि पूर्वकाल में आक्रांताओ से बचने के लिए कुछ कृष्ण भगत और संत मथुरा -वृन्दावन से उनकी मूर्तियों को राजस्थान और गुजरात ले आए । उन्होंने इन हवेलियों में शरण ली ....वे यहाँ कृष्ण भजन गाते और उनसे सम्बंधित लीलाओं -घटनाओ का वाचन करते । उन्होंने इन हवेलियों को कृष्ण मन्दिर में परिवर्तित कर दिया । इन्हे आज भी हवेली ही कहते हैं।
इन हवेली मंदिरों में एक ख़ास बात ये होती है कि यहाँ भगवान् कृष्ण की मूर्ती के पीछे उनसे सम्बंधित चित्र लगाए जाते हैं । जो कपड़े पर उकेरे जाते हैं ...इन्हे पिछवई कहा जाता है । कई बार ये पिछवई कृष्ण के हर श्रंगार के साथ बदल दी जाती है।
इन मंदिरों में आठ पहर के अनुसार आठ बार श्रृगार किया जाता है। जैसे उत्थान ,मंगला ,पूजन ,शयन...आदि -आदि । इसलिए इन आठों पहर के अलग अलग भजन और पद होते हैं।
जब इन हवेलियों की स्थापना की गई थी उस समय एक नई संगीत विधा का भी जनम हुआ था ...इसे हवेली संगीत के नाम से जाना जाता है। हवेली संगीत से ही जुड़े हैं अष्ट पद कवि और उनके द्वारा रचित पद । इन अष्ट पद कवियों में वल्लभाचार्य भी एक थी जिन्होंने मधुराष्ट्रकम की रचना की थी।



अष्ट पद संगीत में केवल कृष्ण पद ही गए जाते हैं । इन पदों मैं थ ,ठ ,ला ,भा , त्र इन शब्दों का प्रयोग नही किया जाता है झूला को झूरा ... बोली को बोरी आदि । इसके पीछे कारण ये है कि भगवान् कृष्ण के कानो को तेज़ आघात न हो ...उन्हें परेशानी न हो .... । आज भी ये हवेली मंदिर वैसे ही हैं ...यकीन न हो तो अगली जन्माष्टमी पर यहाँ आकर ख़ुद ही देख लें ....


मंगलवार, ११ अगस्त २००९

ये जो देस है मेरा

१५ अगस्त आने वाला है .....लोगों के लिए छुट्टी का दिन है ,कुछ घूमे जाने वाले हैं तो कुछ पूरा दिन घर में सो कर बिता देंगे .....कुछ लोगों ने प्लान बनाया है कि नई फ़िल्म इसी दिन देखेंगे....मेरे एक परिचित से मैंने एस बारे मैं बात की ....जवाब क्या मिला ...जानना चाहेंगे ?....

--- ...भाई फिर छुट्टी कहाँ मिलेगी ....
--- ....लेकिन अगर आप ये सब काम करोगे तो १५ अगस्त कौन मनायेगा ?????
---...अरे यार ये सब अब एक दिखावा है ......ये ज़िम्मेदारी तो प्रशासन वालों की है वो मना तो रहे हैं..
--- ... और फिर स्कूल वाले हैं ना ....वो मना लेंगे ....और वैसे भी सेक्योरिटी के हिसाब से भी इस दिन घर में ही रहो तो अच्छा है....
----.....हम तो आपको भी कह रहे हैं घर में मस्त रहिये ....

ओफ्फ्फ ....आख़िर हो क्या गया है लोगों को ?क्यों हो गए हैं सब ऐसे ?.....

....एक बहुत ही सीधी सी बात है ...देश आजाद हुआ है उसकी खुश मनानी है....बस । .... ही पैसे खर्च करने है ... दान देना है फिर ऐसी उदासीनता क्यों ?....
कभी कभी तो लगता है की वास्तव में वो दौर ही ऐसा रहा होगा की लोग देश के लिए नींद- चैन ,घर- बार छोड़ कर मर- मिटे इस धरती के लिए ....अगर उन्होंने उस समय आराम करने का सोचा होता ....?क्या वो अपने घरवालों के साथ समय नही बिताना चाहते होंगे ....?जिनकी वजह से हम आज़ाद हैं, उनको याद करने के लिए कुछ घंटे भी नही हैं हमारे पास .....

यही हाल स्कूल के भी हैं .....कुछ स्कूल इस दिन छुट्टी रखते हैं ताकि उस दिन लड्डू बांटने की आफत से बचना पड़े ....कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम ना करवाना पड़े ..... आफत टले
जहाँ १५ अगस्त मानते हैं वहाँ उस दिन बच्चे स्कूल कम आते हैं ....अगले दिन जब बच्चों से पूछा जाता है की बेटा कल आप क्यों नही आए ....तो फिर वही रटा-पिटा जवाब -मैम हमारी मम्मी ने कहा कल स्कूल नही भेजेंगी .... ।
यानि जैसे हम ख़ुद हैं वैसे ही हम अपने बछो को भी बनाते जा रहे हैं .......
आख़िर ये उदासीनता क्यों?...
क्या देश के लिया हमारा इतना भी कर्तव्य नही ...अगर नही ...तो फिर क्यों हम आए दिन रोते हैं अपनी समस्याओं को लेकर ....सरकारी तंत्र की बुराइयों को लेकर ..... भ्रष्टाचार , लालफीताशाही ,आरक्षण, पक्षपात और महंगाई को लेकर क्यों कोसते हैं सरकार को ....यदि देश के प्रति देशवासियों का कोई कर्तव्य नही, तो देश भी किसी का नही ....समाज की दिशा से किसी को मतलब नही .... वोट डालने ...या १५ अगस्त और २६ जनवरी जैसे त्योहारों से किसी का वास्ता नही ....अपनी ओर से कोई योगदान देना तो दूर .....दूसरों को भी भ्रमित करने में माहिर हैं लोग ....... ।
आज भी मुझे याद है मेरी एक अध्यापिका १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन नई साड़ी पहनती थी ....जिस रंग की साड़ी उसी रंग की चूडियाँ ... इस दिन सज-संवर के आना उन्हें खुशी देता था ....उन्ही से मैंने ये सीखा कि ये दिन आत्मिक खुशी का दिन है और इसी मानना हमारा कर्तव्य है .....
ये मेरे निजी विचार हैं क्या आप भी इनसे साम्यता रखते हैं .....क्या कहा .....हाँ .....



.......यानी इस बार आप १५ अगस्त मानाने जा रहे हैं ....हैं ना ....








रविवार, ९ अगस्त २००९

भावनाए नही बदलती ..

हमारे माता -पिता दोनों में से कौन हमे ज्यादा प्यार करता है ...ये पता लगाना नामुमकिन है .....प्यार की सीमा बाँधने क लिए अगर माँ को धरती मान लिया जाय तो पिता भी आकाश से कम नही है ....हम धरती को छू सकते हैं उस पर खेल सकते हैं लेकिन आसमान को छू पाना ...उसकी गहराई का पता लगना बहुत मुश्किल है .....


जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे लिए 'पापा '...ये शब्द किसी सुपर मैन से कम नही होता .....जो काम हम नही कर सकते वो 'पापा ' कर सकते हैं ....एक फरमाइश करने भर की देर है ....और 'पापा ' उस चीज़ को ले आते हैं ....हमे चोट लग जाए तो गोद में उठाकर दुलारने वाले'पापा'....और जब हमे लगे के हम दुश्मनों से घिर चुके हैं तो उन्हें डराने धमकाने के लिए aएक ही शब्द जुबां पे आता है ............'पापा'


जी ........!कुछ इसी तरह से चल रहा था उस दिन का प्रोग्राम .....जिस दिन फादर्स डे था .... सब कुछ वैसा ही था ...... स्टूडियो ,माइक,हेडफ़ोन, कंसोल और कंप्यूटर ...सब कुछ....पर पता नही क्यों ..... उस दिन मैंने चाहा कि यहाँ आज मेरे साथ पापा होने ही चाहिए ........ ऐसा लग रहा था कि वो अगर स्टूडियो में साथ होते तो ......अचानक गाना बंद हुआ और मुझे एहसास हुआ कि अगला लिंक बोलने का समय गया है। खैर वो प्रोग्राम तो वहीं ख़तम हो गया पर इस के बारे सोचती रही ..... की कैसे समय बीत जाता है पता ही नही चलता जब हम बच्चे होते हैं तो 'पापा'बहुत बड़े लगते हैं .....फिर जब हम और बड़े हो जाते हैं तो 'पापा ' भी बड़े हो जाते है .....लेकिन एक समय ऐसा भी आता है जब हम तो बड़े होते जाते हैं लेकिन पापा ..... बच्चे बन जाते हैं वो हमे हमेशा हौसला देते हैं प्रेरित करते हैं .... पर आगे बढ़ते हुए ....वो तरक्की के साथ ये भी चाहते हैं की हम हमेशा उनके साथ भी रहें ....
इसी को बयान करता हुआ एक इंग्लिश गाना भी है -






Just wanna say ......i love u Papa

बुधवार, २२ जुलाई २००९


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ये कैसी अनभिज्ञता ..?

इतिहास में झांकें तो एक चीज़ जो उभर कर सामने आती है कि सत्ता का उपभोग उन्ही ने किया है जिनके पास शक्ति थी ...... । ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि उन्होंने सत्ता को बचाए रखने के लिए भरसक प्रयास किए । उन्होंने आम जनता को ज्ञान से दूर रखा ताकि वे अधिकारों जैसी किसी चीज़ की मांग ही ना करें । यही सिलसिला आगे तक चलता गया और अब भी जारी है ।

कहने को तो हम २१ वीं सदी में जी रहे हैं .... सूचना प्रोद्योगिकी का दौर है ... दुनिया 'विश्व ग्राम ' में तब्दील हो चुकी है .... भारत नए आयामों को छू रहा है ... कितना सच.... और कितना झूठ..... ये हम सब जानते हैं । इस विषय का अध्ययन करते हुए मुझे कई बार बड़ा अचम्भा हुआ जब मैंने ये देखा कि इस युग में भी कई लोग ऐसे हैं जो डिग्री - धारी तो है , अख़बार भी पढ़ते हैं, टी. वी भी रोजाना देखते हैं फिर भी उन्हें अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नही है । जगह -जगह अभियान , सेमीनार ,लेक्चर्स होते हैं जिससे लोगों में जागरूकता लाई जा सके । लेकिन इसमे भी जनरुचि का अभाव है ..... हास्यास्पद बात ये है कि ऐसी जगह जाने की बजाय लोग सत्संग,फ़िल्म या खरीददारी करने जाना ज्यादा पसंद करते हैं । अक्सर जब मैं अपने मिलनेवाले लोगों को परेशान देखती हूँ .... और पूछती हूँ कि क्यों परेशान हैं ?.... तो मालूम पड़ता है कि किसी सरकारी काम में अड़चन परेशानी की वजह है । इसके जवाब में मैं उन्हें आर .टी.आई.लगाने की राय देती हूँ ,तो वे कहते हैं .....
क्या .... आर .टी.आई.? ये क्या है?...... हमें कोर्ट - कचहरी नही जाना ? या .... अरे हम तो आम लोग हैं .....हम क्या जाने ये कानून -वानून क्या है?.... कहने का मतलब ये है कि स्थिति आज भी जस कि तस है ।ऐसा लगता जैसे सबको इस तरह जीने की आदत पड़ गई है ।

दूसरी तरफ़ सरकारी महकमों में आर.टी.आई.एक हौवा है .... निचले तबके के कर्मचारी इस शब्द का उपयोग तो करते हैं ....पर ये क्या है .....इस बारे में उन्हें नही पता । आला -अधिकारी सूचना के अधिकार के तहत लगे प्रार्थना -पत्रों से परेशान हैं । कुछ दिन पहले इस क़ानून के दुरोपयोग कि बात चल रही थी... इस पर किसी ने कहा कि इस कानून का दुरोपयोग नही हो सकता ..... । लेकिन जनाब ऐसा नही है .... आपको ये जानकर हैरानी होगी कि आकाशवाणी जयपुर में लगभग २७० प्रार्थना -पत्र कार्यालय में कार्यरत लोगों ने ये जानने के लिए लगाये कि अमुख गाना किस दिन बजा .....पिछले २ ,६ या ८ महीनों में कितनी बार बजा ...... या पिछले साल अमुख फ़िल्म के गाने कितनी बार बजे...... । निश्चित ही ये जानकारी किसी तरह की ज्ञान वृद्धि नही करने वाली । हाँ , ये बात और है कि इस तरह की सूचनाएँ एकत्रित करते -करते आकाशवाणी के प्रशासक और अधिकारी संगठन के मुख्य उद्देश्य यानि प्रसारण को छोड़ लॉग बुक ही उलटते -पलटते रह जाए ।
सूचना का अधिकार एक नया कानून है ..... कुछ लोंग इस से अनभिज्ञ हैं .... कुछ अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं ....और जो इस से भिज्ञ हैं वे इसका जमकर उपयोग कर रहे हैं .......या ....... इससे कुछ अधिक कहें तो .............दुरुपयोग....................!