गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

औरत .... . औरत .....!और औरत ......?


हमेशा की तरह आज भी वो उसज कुर्सी पर बैठी है ,शायद कोई ऐसा काम कर रही है जिसे करने में उसे मुश्किल आ रही है....छुट्टी हो चुकी है ...एक -एक कर के सभी लोग स्टाफ -रूम में इकट्ठा हो रहे हैं .....इतने दिनों बाद उसे अपने बीच देख कर सभी हैरान हैं .... आज यहाँ का माहौल बदला बदला सा है । रोज़ की तरह हल्ला - गुल्ला नहीं है ....कोई फालतू गप्पबाज़ी भी नहीं ... सभी चुप है.....छुप छुप के उसे देख रहे हैं .... गले पर दिखते निशान .... उसके भयानक कदम के साक्षी हैं ....जो देखने वालों के रोंगटे खड़े करते हैं ....दुःख देते हैं .... पूछना सभीचाहते हैं ....जानना चाहते हैं कि वो कैसी है ? आखिर उसने ऐसा क्यों किया ? क्यों उसके सब्र का बाँध टूट गया ....जो उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया ......



चहेरे पर थकावट है ...नीची नज़रें कर के वो अपना काम जल्द से जल्द ख़तम कर देना चाहती है ....मैं उसकी हिम्मत देख कर हैरान हूँ कि वो इतनी जल्दी स्कूल कैसे आ गई ????....चाह रही हूँ कि उसको गले लगा कर खूब रो लूँ ....जो दुःख उसकी आखों में है उसे दूर करना चाह रही हूँ ...लेकिन हिम्मत नहीं हो पा रही ....मैं इसी उधेड़बुन से नहीं उबर पाई कि वो खासी तकलीफ के साथ अपनी कुर्सी से उठती है और मेरे पास आती है .....बोलने में उसे काफी दिक्कत आ रही है .....आज उसकी आवाज़ में जोश नहीं है ....शायद दुपट्टा कुछ ज्यादा कस गया था ......दबी और थकी आवाज़ में बोली "तुम भी मुझसे मिलने नहीं आई ....किसी और से तो नहीं ....पर मुझे ये उम्मीद थी के तुम तो मिलने ज़रूर आओगी ....क्या हम लोग एक हाउस के हैं ...बस हमारी दोस्ती यहीं तक है ...."
आंसू नहीं रुक पाए ..सो बह गए .....मैं उसे अपने साथ वहाँ से पास कि क्लास में ले आई....
मैंने पूछा "अभी कहाँ रह रही हो...?"
..."ससुराल में "..उसने कहा ।
....."क्या ?.....क्या हो तुम ?...जिन लोगों ने तुम्हे मरने के लिए छोड़ दिया ....परवाह भी नहीं की ...अब भी उन्ही के साथ हो...क्यों ?"
......हाथ जोड़ कर ,भरी हुई आखों से जवाब देती है ....."मेरे दो बच्चे हैं .....और पति का बर्ताव भी बदल गया हैं......वो बुरे नहीं हैं ...... प्यार भी करते हैं... ....शायद अब सब कुछ ठीक हो जायेगा .....वो कहते हैं कि अब वो मेरा ख़याल रखेंगे...."। "अगर घर में रहना इतना मुश्किल है तो ...."
मेरी बात अभी पूरी भी नहीं होती कि वो कहती है कि "औरत की ज़िन्दगी यही है ....चाहे हम १८ वी सदी में जिए या २१ में.... औरत वहीं कि वहीं हैं .... जूतों के नीचे ...
मैंने उन्हें कई बार समझाया ...पर वो नहीं माने ....और जब तक उन्हें मेरी हालत का सही अंदाज़ा हुआ तब तक मेरी हिम्मत टूट गई थी ....."थोड़ी देर चुप रहती है फिर कहती है ..."लेकिन ये सच है कि प्यार तो वो मुझे अब भी करते हैं .... ।
उसकी ये बात मेरी समझ से परे है ... सवाल बहुत सारे थे लेकिन और कुछ पूछ सकूँ ऐसे हालात नहीं लगे ....
घडी कि तरफ देखा और बोला"घर चलने का टाइम हो गया है ....चलो मैं तुम्हे छोड़ दूंगी । "
...उसने मुझे कहा .".....नहीं तुम चलो ....उन्होंने कहा है कि वो मुझे लेने आयेंगे ....मैं यहाँ उनका इंतज़ार करूंगी ।"


........उसकी बात सुन कर मुझे लगा ये कि ....हाँ ये सच है....







औरत का मन ....कोई नहीं पढ़ सकता ...कोई नहीं.....शायद ....कोई दूसरी औरत भी नहीं.... 0 टिप्पणियाँ

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

फितरत








सभी पहाड़ एक से नहीं होते .....कुछ ऊचे तो कुछ कम लम्बे होते हैं ....कुछ हरे भरे और कुछ...... कुछ उजड़े ...कुछ हमेशा ...हर मौसम में एक से ही रहते हैं ....






कुछ पहाड़ रंग भी बदलते हैं ...जैसे जैसे आसमान की चमकती गेंद पाला बदलती है वैसे ही ये भी बदल जाते हैं ....









सभी पहाड़ दूसरी तरफ गुजरने की इजाज़त नहीं देते .....जैसे हुकूमत करते हैं ......
हाँ ! कुछ पहाड़ों में मोड़ भरे छोटे ....लेकिन टेढ़े -मेढ़े रास्ते होते हैं ...गुज़रते समय डर का एहसास करवाते हैं ...ये ... ।






सभी पहाड़ सूखे नहीं होते ...घने दरख्तों ....खुशबूदार फूलों और फलों से भरे होते हैं ....



और कुछ हरियाली ओढ़े हुए भी सूखे होते हैं ....











कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कुछ पहाड़ शाप भी देते हैं ....













सभी पहाड़ आवाज़ नहीं देते ....कुछ ठंडी पुरवा के साथ ख़ामोशी से कानो के नज़दीक चुपके से कोई पैग़ाम छोड़ जाते हैं







......तो कुछ कोसों .....मीलों दूर से अपने पास बुलाते हैं ....






हाँ ! सभी पहाड़ एक से नहीं होते .......लेकिन फितरत के लिहाज़ से ..... क्या ये हम जैसे नहीं होते ?

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

तहलका -ऐ -तेलंगाना


मेरा ऐसा मानना है कि हम इतिहास से निकल कर पुनः उसी ओर मुड़ रहे हैं ...आपको यह भी बता दूँ कि यह वक्तव्य किस सन्दर्भ में दे रही हूँ ....सन १९५६ में भारत में १४ राज्य थे ..... यह संख्या वर्ष २००० तक दुगनी हो गई ..... आज़ादी के बाद भारत के तमाम छोटे बड़े हिस्सों को जोड़ कर भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया गया . समय -समय पर विभिन्न संशोधनों के द्वारा राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन यह कह कर किया गया कि इससे क्षेत्र विशेष का विकास हो सकेगा ....लेकिन ये आप भी जानते हैं कि (चाहे वे उत्तर - पूर्वी राज्य हों,हरियाणा हो या नवगठित झारखण्ड ,छत्तीसगढ़ या उत्तराखंड ) कितना और किनका विकास हुआ है?... हो सकता है आने वाले समय में दुगने से ज़्यादा ....या तिगुना और फिर उससे भी ज़्यादा हो जाए ....निश्चित ही मेरी इस बात से कई लोग सहमत न होंगे ....लेकिन आने वाले ५०-६० सालों में ऐसा हो जाए तो इसमे कोई बड़ा आश्चर्य नही होगा .....




अब तेलंगाना को ही ले लीजिये ....क्यों इतना हल्ला मचाया जा रहा है ....क्यों बनना चाहिए नया राज्य .....किस तरह का विकास चाहिए ...नया राज्य मात्र बन जाने से तेलंगाना का विकास हो जाएगा ....और सबसे अहम बात मौजूद परिस्तिथियों में क्या नए राज्य का गठन सम्भव है ....


किसी भी क्षेत्र विशेष को राज्य बनने के लिए जब जब राजनितिक पहल कि जाती है ...तो कई वर्षों तक उस पार्टी का उत्थान होता ही रहता है ....पार्टी अपने रजनीतिक हितों को साधने में कामयाब रहती है ....जनता उसे अपने हितों के संरक्षक के रूप में देखती है ...जबकि वास्तविकता यह है वर्तमान में देश या जनता के विकास कि किसी को चिंता ही नही है ....

रही बात विकास कि ...तो तेलंगाना को ही ले लीजिये ....आन्ध्र प्रदेश से इस क्षेत्र को इसलिए अलग किए जाने कि मान हो रही है क्योंकि वहां विकास उस गति से नही हो रहा है जिस गति से आन्ध्र के अन्य जिलों का हुआ है ....साथ ही एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि तेलंगाना सांस्कृतिक रूप से भी आन्ध्र से अलग है .....आप ही बताएं क्या आपको लगता है भारत जैसे देश में ये तर्क नए राज्य के निर्माण के लिए पर्याप्त हैं .....कुछ एक राज्यों को छोड़ दे तो शेष आदि राज्यों के कई क्षेत्रों का हाल तेलंगाना के जैसा ही है .....रही बात सांस्कृतिक विविधता कि ....तो हमारे देश से ज़्यादा विविधता और किस देश में होगी जहाँ हर ५० मील पर बोली ,रहन -सहन ,रीत-रिवाज़
आदि बदल जाते है .....



तेलंगाना के सन्दर्भ में विभाजन सामाजिक से ज्यादा राजनितिक प्रभुत्व का मुद्दा बन गया है । इसके अलावा यह गठन कठिन भी है कठिन इस लिए है क्योंकि किसी भी .क्षेत्र विशेष को राज्य बनाने की संविधान में एक सुनिश्चित प्रक्रिया है ...एस प्रक्रिया क अनुसार पहले राज्य विधान सभा में एक प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए ,जिसमें ऐसे किसी नवीन राज्य की इच्छा का समर्थन किया गया हो ...राज्य विधान सभा से भेजा प्रस्ताव संसद में रखा जाता है और संसद में बहुमत से पारित होने के बाद प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है ... इस लम्बी और जटिल प्रक्रिया के बाद ही नवीन राज्य का गठन संभव है ...


तेलंगाना को राज्य बनाने के मामले में सबसे बड़ी अड़चन राज्य विधान सभा से न मिलने वाला समर्थन है ...बड़ी या छोटी किसी भी तरह की राजनितिक पार्टी का इस ओर सकारात्मक फिलहाल नज़र नहीं आ रहा ....
एक प्रकार से यह कहा जा सकता है की टी .आर .एस . द्वारा समर्थित राजनितिक स्वार्थ साधने वाले मुद्दे को अब काबू में लाना अब मुश्किल है .... राज्य बने या न बने चन्द्रशेखर राव तो मसीहा बन गए और अगर राज्य बने तो क्षेत्र के नाम पर अपना विकास तो हो ही जायेगा
यहाँ तेलंगाना की आग बुझने का नाम नहीं ले रही वहां मायावती ने अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए इस हवन कुंड में उत्तर प्रदेश के विभाजन की नई सामग्री डाल दी है ...ऐसी ही आवाज़ विदर्भ और अन्य क्षेत्रों से उठती ही रहती है ....कुल मिलकर इस राजनीती के इस 'फेस्टिव -सीज़न ' का फायदा ऐसी सभी राजनितिक पार्टियाँ उठाना चाहती हैं ... कोई पूछे इनसे कि विभाजन करते करते कहीं हम फिर से छोटे -छोटे ठिकानो और रियासतों या राजा और नवाबों युग में तो नहीं जाने वाले ...!

......... विचारणीय बात यह है कि निज स्वार्थों की पूर्ती के लिए इसी तरह की मुहीम हर राज्य की क्षेत्रीय पार्टी छेड़ दे ...तो क्या आप मेरे द्वारा कही गई बात से सहमत नहीं होंगे ...?

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

क्यों कैट पर भारी पड़े माउस ...?



हाल ही में कैट प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की गई । पहली बार यह परीक्षा ऑनलाइन ली गई लेकिन हश्र क्या हुआ इससे सभी वाकिफ हैं । एस वाकिये से जो बात उभर के सामने आती है वो ये कि शिक्षा के उच्च स्तर पर भी हमारे संसाधन उतने ही लचर हैं जितने कि प्राथमिक या माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के हैं । भारतीय प्रतियोगी परीक्षाएं चाहे वे प्रशासनिक सेवाएँ हो या कैट ,मैट या अन्य कोई प्रतियोगी परीक्षा एक मानक स्तर प्राप्त कर चुकी हैं । लेकिन अध्ययन और अध्यापन कि ओर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे की तमाम कोशिशों के बाद भी हमारा देश अध्यापन के तकनिकी क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है । यह अलग बात है की अध्यापन की नई तकनीकों की खोज जारी है किन्तु क्या इन तकनीकों को लागू करने में हम सक्षम हैं ?

नित नई परीक्षाएं जन्म ले रही हैं साथ ही नई पद्धतियाँ निर्धारित की जा रही हैं . शिक्षा भी एक कोर्पोरेट उद्योग की भाति दिन दूनी रात चौगुनी उन्नत्ति कर रहा है .ज्यादा दूर न जा कर केवल प्राथमिक स्तर पर गौर करें तो आप पायेंगे की गली मोहल्ले में सब्जी-भाजी की दूकाने उतनी नहीं होंगी जितने प्राइमरी स्कूल . अछे स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहते हैं तो कई दिनों तक कतारों में लग कर भी सफलता मिल जाए तो अपने आप को धन्य मानिए .





अध्यापन पद्धति की चर्चा करें तो हम पायेंगे कि प्राथमिक स्तर से लेकर कॉलेज तक एक पद्धति बहुत लोकप्रिय है जिसे लेक्चर मैथड कहा जाता है और मूल्यांकन का भी यही हाल है . कहने का तात्पर्य यह है कि महज़ अच्छी बिल्डिंग , सुसज्जित कक्षा-कक्ष,प्रशिक्षित अद्यापक ,कुछ सुंदर सहायक शिक्षण सामग्री होने से स्कूल अच्छा है इसकी गारंटी हो जाती है...?

अब भी उन्ही पारंपरिक तौर -तरीकों से अध्यापन और मूल्यांकन किया जा रहा है , जिन से किसी ज़माने में हमारे माता -पिता का हुआ करता था . तात्पर्य यह है कि उन्नत संसाधन होना जितना आवश्यक है उतना ही ज़रूरी उन संसाधनों का उपयोग. प्रशिक्षित शिक्षक होने के साथ-साथ नवीन तकनीकों से अद्यापन भी ज़रूरी है .इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि मूल्यांकन भी नवीन पद्धतियों से हो ....पूर्व समय में पारंपरिक शिक्षा पद्धति सामानयज्ञों को तैयार करने में अव्वल थी ....लेकिन आज ज़माना विशेषज्ञता का है .





.... हो सकता है कोई बच्चा जितना अच्छा लिखने के कौशल में अंक ला सकता हो ...उतना पढने या रचनात्मक कौशल में न ला सके .....इसके विपरीत कोई विद्यार्थी ऐसा भी हो सकता है जो क्रियात्मक कौशल में उम्दा हो मगर लिखने में कमज़ोर ...अतः आवश्यता है प्रत्येक कौशल के अनुसार परीक्षा पद्धति विकसित करने की साथ ही नवीन संसाधनों के त्वरित विकास की . ताकि प्रारंभिक स्तर से ही विद्यार्थी विशेष की रूचि का पता चल सके ....१२ वीं कक्षा के बाद वह अँधेरे में तीर चलाते सिपाही जैसा न बने .... और आने वाले समय में कोई माउस किसी कैट पर भरी न पड़े

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

जन्माष्टमी और हवेली मन्दिर


पिछले दिनों जन्माष्टमी बड़े धूम - धाम से मनाई गई । यहाँ उत्तर भारत की जन्माष्टमी मुख्य रूप से राजस्थान ,गुजरात और उत्तर प्रदेश में यह दिन अलग तरह से मनाया जाता है। कई दिन पहले से कृष्ण जनम झांकियां और लीलाएं शरू हो जाती हैं। मंदिरों को हज रोज़ एक नए तरीके से सजाया जाता है ,कभी मोतियों से तो कभी फूलों से । इन दिनों मदिरों का श्रंगार दिन मैं कई बार बदला जाता है।

हर बार नए रूप में कृष्ण और उनसे सम्बंधित घटनाओं का चित्रण और सजावट की जाती है ।


यहाँ के कृष्ण मंदिरों की कई विशेषताएँ हैं ,जैसे इन मंदिरों का स्थापत्य ...कृष्ण -श्रंगार ....झांकियां इत्यादि ...मंदिरों को अगर ध्यान से देखें तो ये किसी हवेली जैसे लगते हैं । इसका कारन ये है कि पूर्वकाल में आक्रांताओ से बचने के लिए कुछ कृष्ण भगत और संत मथुरा -वृन्दावन से उनकी मूर्तियों को राजस्थान और गुजरात ले आए । उन्होंने इन हवेलियों में शरण ली ....वे यहाँ कृष्ण भजन गाते और उनसे सम्बंधित लीलाओं -घटनाओ का वाचन करते । उन्होंने इन हवेलियों को कृष्ण मन्दिर में परिवर्तित कर दिया । इन्हे आज भी हवेली ही कहते हैं।
इन हवेली मंदिरों में एक ख़ास बात ये होती है कि यहाँ भगवान् कृष्ण की मूर्ती के पीछे उनसे सम्बंधित चित्र लगाए जाते हैं । जो कपड़े पर उकेरे जाते हैं ...इन्हे पिछवई कहा जाता है । कई बार ये पिछवई कृष्ण के हर श्रंगार के साथ बदल दी जाती है।
इन मंदिरों में आठ पहर के अनुसार आठ बार श्रृगार किया जाता है। जैसे उत्थान ,मंगला ,पूजन ,शयन...आदि -आदि । इसलिए इन आठों पहर के अलग अलग भजन और पद होते हैं।
जब इन हवेलियों की स्थापना की गई थी उस समय एक नई संगीत विधा का भी जनम हुआ था ...इसे हवेली संगीत के नाम से जाना जाता है। हवेली संगीत से ही जुड़े हैं अष्ट पद कवि और उनके द्वारा रचित पद । इन अष्ट पद कवियों में वल्लभाचार्य भी एक थी जिन्होंने मधुराष्ट्रकम की रचना की थी।



अष्ट पद संगीत में केवल कृष्ण पद ही गए जाते हैं । इन पदों मैं थ ,ठ ,ला ,भा , त्र इन शब्दों का प्रयोग नही किया जाता है झूला को झूरा ... बोली को बोरी आदि । इसके पीछे कारण ये है कि भगवान् कृष्ण के कानो को तेज़ आघात न हो ...उन्हें परेशानी न हो .... । आज भी ये हवेली मंदिर वैसे ही हैं ...यकीन न हो तो अगली जन्माष्टमी पर यहाँ आकर ख़ुद ही देख लें ....


मंगलवार, 11 अगस्त 2009

ये जो देस है मेरा

१५ अगस्त आने वाला है .....लोगों के लिए छुट्टी का दिन है ,कुछ घूमे जाने वाले हैं तो कुछ पूरा दिन घर में सो कर बिता देंगे .....कुछ लोगों ने प्लान बनाया है कि नई फ़िल्म इसी दिन देखेंगे....मेरे एक परिचित से मैंने एस बारे मैं बात की ....जवाब क्या मिला ...जानना चाहेंगे ?....

--- ...भाई फिर छुट्टी कहाँ मिलेगी ....
--- ....लेकिन अगर आप ये सब काम करोगे तो १५ अगस्त कौन मनायेगा ?????
---...अरे यार ये सब अब एक दिखावा है ......ये ज़िम्मेदारी तो प्रशासन वालों की है वो मना तो रहे हैं..
--- ... और फिर स्कूल वाले हैं ना ....वो मना लेंगे ....और वैसे भी सेक्योरिटी के हिसाब से भी इस दिन घर में ही रहो तो अच्छा है....
----.....हम तो आपको भी कह रहे हैं घर में मस्त रहिये ....

ओफ्फ्फ ....आख़िर हो क्या गया है लोगों को ?क्यों हो गए हैं सब ऐसे ?.....

....एक बहुत ही सीधी सी बात है ...देश आजाद हुआ है उसकी खुश मनानी है....बस । .... ही पैसे खर्च करने है ... दान देना है फिर ऐसी उदासीनता क्यों ?....
कभी कभी तो लगता है की वास्तव में वो दौर ही ऐसा रहा होगा की लोग देश के लिए नींद- चैन ,घर- बार छोड़ कर मर- मिटे इस धरती के लिए ....अगर उन्होंने उस समय आराम करने का सोचा होता ....?क्या वो अपने घरवालों के साथ समय नही बिताना चाहते होंगे ....?जिनकी वजह से हम आज़ाद हैं, उनको याद करने के लिए कुछ घंटे भी नही हैं हमारे पास .....

यही हाल स्कूल के भी हैं .....कुछ स्कूल इस दिन छुट्टी रखते हैं ताकि उस दिन लड्डू बांटने की आफत से बचना पड़े ....कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम ना करवाना पड़े ..... आफत टले
जहाँ १५ अगस्त मानते हैं वहाँ उस दिन बच्चे स्कूल कम आते हैं ....अगले दिन जब बच्चों से पूछा जाता है की बेटा कल आप क्यों नही आए ....तो फिर वही रटा-पिटा जवाब -मैम हमारी मम्मी ने कहा कल स्कूल नही भेजेंगी .... ।
यानि जैसे हम ख़ुद हैं वैसे ही हम अपने बछो को भी बनाते जा रहे हैं .......
आख़िर ये उदासीनता क्यों?...
क्या देश के लिया हमारा इतना भी कर्तव्य नही ...अगर नही ...तो फिर क्यों हम आए दिन रोते हैं अपनी समस्याओं को लेकर ....सरकारी तंत्र की बुराइयों को लेकर ..... भ्रष्टाचार , लालफीताशाही ,आरक्षण, पक्षपात और महंगाई को लेकर क्यों कोसते हैं सरकार को ....यदि देश के प्रति देशवासियों का कोई कर्तव्य नही, तो देश भी किसी का नही ....समाज की दिशा से किसी को मतलब नही .... वोट डालने ...या १५ अगस्त और २६ जनवरी जैसे त्योहारों से किसी का वास्ता नही ....अपनी ओर से कोई योगदान देना तो दूर .....दूसरों को भी भ्रमित करने में माहिर हैं लोग ....... ।
आज भी मुझे याद है मेरी एक अध्यापिका १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन नई साड़ी पहनती थी ....जिस रंग की साड़ी उसी रंग की चूडियाँ ... इस दिन सज-संवर के आना उन्हें खुशी देता था ....उन्ही से मैंने ये सीखा कि ये दिन आत्मिक खुशी का दिन है और इसी मानना हमारा कर्तव्य है .....
ये मेरे निजी विचार हैं क्या आप भी इनसे साम्यता रखते हैं .....क्या कहा .....हाँ .....



.......यानी इस बार आप १५ अगस्त मानाने जा रहे हैं ....हैं ना ....








रविवार, 9 अगस्त 2009

भावनाए नही बदलती ..

हमारे माता -पिता दोनों में से कौन हमे ज्यादा प्यार करता है ...ये पता लगाना नामुमकिन है .....प्यार की सीमा बाँधने क लिए अगर माँ को धरती मान लिया जाय तो पिता भी आकाश से कम नही है ....हम धरती को छू सकते हैं उस पर खेल सकते हैं लेकिन आसमान को छू पाना ...उसकी गहराई का पता लगना बहुत मुश्किल है .....


जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे लिए 'पापा '...ये शब्द किसी सुपर मैन से कम नही होता .....जो काम हम नही कर सकते वो 'पापा ' कर सकते हैं ....एक फरमाइश करने भर की देर है ....और 'पापा ' उस चीज़ को ले आते हैं ....हमे चोट लग जाए तो गोद में उठाकर दुलारने वाले'पापा'....और जब हमे लगे के हम दुश्मनों से घिर चुके हैं तो उन्हें डराने धमकाने के लिए aएक ही शब्द जुबां पे आता है ............'पापा'


जी ........!कुछ इसी तरह से चल रहा था उस दिन का प्रोग्राम .....जिस दिन फादर्स डे था .... सब कुछ वैसा ही था ...... स्टूडियो ,माइक,हेडफ़ोन, कंसोल और कंप्यूटर ...सब कुछ....पर पता नही क्यों ..... उस दिन मैंने चाहा कि यहाँ आज मेरे साथ पापा होने ही चाहिए ........ ऐसा लग रहा था कि वो अगर स्टूडियो में साथ होते तो ......अचानक गाना बंद हुआ और मुझे एहसास हुआ कि अगला लिंक बोलने का समय गया है। खैर वो प्रोग्राम तो वहीं ख़तम हो गया पर इस के बारे सोचती रही ..... की कैसे समय बीत जाता है पता ही नही चलता जब हम बच्चे होते हैं तो 'पापा'बहुत बड़े लगते हैं .....फिर जब हम और बड़े हो जाते हैं तो 'पापा ' भी बड़े हो जाते है .....लेकिन एक समय ऐसा भी आता है जब हम तो बड़े होते जाते हैं लेकिन पापा ..... बच्चे बन जाते हैं वो हमे हमेशा हौसला देते हैं प्रेरित करते हैं .... पर आगे बढ़ते हुए ....वो तरक्की के साथ ये भी चाहते हैं की हम हमेशा उनके साथ भी रहें ....
इसी को बयान करता हुआ एक इंग्लिश गाना भी है -






Just wanna say ......i love u Papa