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बुधवार, 25 नवम्बर 2009

अब राइट टु रिकाल चाहिए ...




१९४७ में संविधान निर्माण के समय..... विश्व के अनेक संविधानों से कई उपबंधों का समावेश हमारे संविधान में भी किया गया । इसके पीछे के उद्देश्य के बार में हम सभी जानते हैं ..... लेकिन इस वक्त जिस बात का ज़िक्र मैं करना चाहती हूँ वो ये है कि...समय ,परिस्तिथी तथा देश काल के अनुरूप हर वस्तु परिवर्तन चाहती है .... कहने का तात्पर्य ये है कि तालाब का पानी बनने से बेहतर है बहता झरना बना जाए ।


बीते कुछ सालों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब लगता है ....अरे॥! किसने इस आदमी को लोकसभा में पहुंचा दिया .... । कई बार विधानसभाओं में शर्मसार कारनामे हुए हैं ....जिन्हें लोगों ने टी.वी.पर देखा है । और घोटालों तथा अपराधीकरण की तो बात ही छोडिये....इन सब की फेहरिस्त बने तो एक नए महाकाव्य का जनम हो सकता है । ऐसा लगता है कि हम लोग लोकतंत्र की मूल भावना को भूल गए हैं । 'विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र ' ये एक ऐसा राग है जिसे कभी कभी हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि आलाप देते हैं .... जो वास्तविक अर्थ से कोसो दूर है।


दरअसल इन राजनीतिक पार्टियों के पास सत्ता की स्वार्थ परक रोटियाँ सकने के लिए मुद्दे चाहिए जैसे जातिवाद .... धर्म तथा भूमिगत आधार पर कैसे .... । अब यक्ष प्रश्न ये है कि- वर्ष के लिए जिन प्रतिनिधियों को देश की बागडोर सौपी जाती है उनके काम का मूल्यांकन कैसे किया जाए .....कैसे उन्हें जवाबदेह बनाया जाए ? कैसे उनको सत्ता से बाहर जा sakta रखा है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर है राइट टु रिकाल . इसका अर्थ है प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की व्यवस्था . इस व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण इस समय स्वित्ज़रलैंड का संविधान है .नेताओं के कार्यों और निर्णयों का वार्षिक मूल्यांकन होना चाहिए , साथ ही भ्रष्ट और जनता में जातिवाद भाषावादी और क्षेत्रवादी उन्माद फ़ैलाने वाले नेताओं का मूल्यांकन भी जनता के सामने रखा जाए

जो नेता या प्रतिनिधि अपने व्यतिगत वायदों और कार्यों के प्रति ईमानदार न लगे उसका कार्यकाल समाप्त कर उसके स्थान पर उस व्यक्ति को मौका दिया जाना चाहिए जो चुनावो में सर्वाधिक वोट पाने वाला द्वितीय उमीदवार रहा हो .

राइट टु रिकाल व्यवस्था के अंतर्गत उन व्यक्तियों को भी सदन से अस्थाई तौर पर निलंबित कर देना चाहिए जो किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हों . यह एक अलग और हास्यास्पद बात होगी की इस तरह की व्यवस्था से भारत की विधानसभाएं और लोकसभा सूनी हो जाएँगी . लेकिन इसका सार्थक पहलू यह होगा की नए लोगों को अवसर उपलब्ध होगा . यह नहीं कहा जा सकता की इस व्यवस्था से भ्रष्टाचार और स्वार्थपरक राजनीति का अंत हो जायेगा लेकिन तंत्र सुधार की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम होगा ..

2 टिप्पणियाँ:

sanjay vyas ने कहा…

thought-provoking.
hope to see you more regularly.

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

ये अधिकार तो मिलना ही चाहिए...!!!एक मामूली नौकरी के लिए भी सौ सौ शर्ते होती है,जबकि ये नेता एक बार जीतते ही ५ साल के लिए पक्के हो जातेहै...देश लूटने के लिए.....................कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दीजिये...टिप्पणी देने में आसानी रहेगी..